बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

भारत की हर बात निराली.....डा श्याम गुप्त......


 पर  भा की बात निराली 

सारा जग सुंदर अति सुंदर,
पर भारत की बात निराली |
गूंजे  प्रेम-प्रीति की भाषा ,
 वन उपवन तरु डाली डाली |
मेरे देश की बात निराली,
भारत की हर बात निराली ||

गली गली है गीत यहाँ की ,
गाँव शहर संगीत की थिरकन |
पगडंडी सी   नीति -कथाएं ,
हाट डगर मग प्रीति की धडकन |
नदी नहर जल मधु की प्याली , 
पथ पथ सत् की कथा निराली |

प्रेम की भाषा डाली डाली .
इस भारत की बात निराली ||

अपने अपने नियम धर्म सब,
अपने अपने ब्रह्म ईश सब |
अपनी अपनी कला कथाएं ,
अपनी अपनी रीति व्यथाएँ |
अलग अलग रंग प्रीति निराली ,
भिन्न भिन्न हर ड़ाली डाली |

एक तना जड़ एक निराली,
इस भारत की बात निराली ||

कर्म के साथ धर्म की भाषा ,
अर्थ औ काम मोक्ष अभिलाषा |
जीवन की गतिमय परिभाषा |
विविधि धर्म मत जाति के बासी ,
बहु विचार बहु शास्त्र कथा सी |
भोर-सांध्य की प्रेम-व्यथा  सी |

बहुरंगी संस्कृति की थाली,
प्रेम की भाषा डाली डाली ||

गीता स्मृति वेद उपनिषद ,
गूढ़  कथाएं ये पुराण सब |
विविधि शास्त्र इतिहास सुहाना,
 कालिदास प्रभृत्ति विद्वाना |
सुर  भूसुर  भूदेव  महीसुर,
नर-नारायण, संत कवीश्वर |

प्रथम भोर ऊषा की लाली ,
प्रिय भारत की छटा निराली ||

बुधवार, 25 जनवरी 2012

एक अगीत ...खुशहाल गणतंत्र ...डा श्याम गुप्त

वे राष्ट्रगान गाकर 
जनता को देश पर मर मिटने की,
कसम दिलाकर ;
बैठ गये लक्ज़री कार में जाकर ।      
टोपी पकडाई पी ए को,
अगले वर्ष के लिये -
रखे धुलाकर ॥

 
 हमारा सच्चा खुशहाल गणतंत्र दिवस ,
तब होगा, जब हमारा प्यारा भारत ;        
भ्रष्टाचार, अनैतिकता से मुक्त होगा ।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

अब नर नवजात भ्रूण ह्त्या .... डा श्याम गुप्त


                       यह समाचार जान कर निश्चय ही यह तथ्य सही ठहरता है कि इन सब सामाजिक बुराइयों  का मूल कारण  मानव आचरण  है न कि स्त्री उत्प्रीणन  आदि आदि...जब जिसका पक्ष भारी होजाता है वह दूसरे पर उत्प्रीणन करने लगता है ....
              यह भी जानना चाहिए कि उपरोक्त चित्रित समाचार में जो चर्च का कथन चिन्हांकित -----उसके भी गहन अर्थ हैं   कि -- इस बहाने चर्च प्रचार करना चाहता है...
---- पिछली सदी से ही मेघालय में चर्च सक्रिय है ...काफी जनता ईसाई है परन्तु फिर भी चर्च के कथनानुसार नैतिक मूल्यों में गिरावट आरही है ...क्यों ...तो अब तक ...चर्च का रोल क्या रहा ..???
---अब तक चर्च क्या कर रहा था ...जो माताओं , महिलाओं को मान -मर्यादा के बारे में बताएगा .....भारतीय महिलाओं की मान -मर्यादा के बारे में चर्च को क्या पता .....
-----मातृ सत्तात्मकता में क्यों नर भ्रूण की ह्त्या होनी चाहिए ?  ....यह सीधा सीधा अनैतिकता का मामला है....

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बाल गीत ...शिव जी....डा श्याम गुप्त...

नाग गले में लिपटे रहते ,
चन्दा माथे पर जिनके                     
जटाजूट में गंगा बहती,
है त्रिशूल कर में उनके ||

नेत्र तीसरा है मस्तक पर,
नीला कंठ सुहाया है |
कटि पर हैं  मृगछाला बांधे,
तन पर भस्म रमाया है ||

बच्चो ! ये भोले शंकर हैं,   
शिव-शंभू भी कहलाते |
देवों के भी देव हैं, इससे-
महादेव बोले जाते ||

अर्थ ये लिपटे नागों का है ,
दुष्टों को बस में करते |
फिर भी शीतल रहे ह्रदय, वे-
चन्दा माथे पर धरते  ||

जग के कष्टों का विष पीकर,
नीलकंठ बन जाते हैं |
सत तम रज का त्रिशूल थामे,
प्रेम की गंगा बहाते हैं ||

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

बाल गीत, माँ दुर्गा ......डा श्याम गुप्त....

                             अभी तक शारदीय नवरात्र  चल रहे थे ...सभी  लोगों ने दुर्गा पूजा का भी खूब आनंद लिया...दशहरा  का भी.....राम नवमी का भी ......इन्ही ..या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता .....दुर्गा की पूजा करके राम ने रावण पर विजय के लिये  आवश्यक शक्ति प्राप्ति रूपी वरदान प्राप्त किया था ....प्रस्तुत है दुर्गा  के शक्तिरूपी रूपों पर एक बाल गीत के रूप में परिचय.....

भक्तों की तारिणी माँ ,आठ भुजा धारी है |
कर में त्रिशूल, कमल, खड्ग गदा धारी है ||

शंख  चक्र  धनुबाण , ओउम् करतल सोहे |
स्वर्ण आभूषण जटित,धवल कांति मन मोहे ||

शैलपुत्री , चंद्रघंटा, कूष्मांडा, ब्रह्मचारिणी |
 स्कंदमाता, कालरात्रि   और  कात्यायिनी ||

महागौरी, सिद्धिदात्री , नव रूप धारी है  |
मुख पे मुस्कान धवल, दुष्ट दलनकारी है ||

सृष्टि  की सृजक  माता,जग पालन हारी है |
आदिशक्ति, जगदम्बे , लाल वस्त्र धारी है ||

दुर्गति निवारिणी माँ ,दुःख:हरण हारी है |
बच्चो! ये दुर्गा माँ , सिंह की सवारी है ||

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

माँ की आराधना--हरिगीतिका छंद...ड़ा श्याम गुप्त ...

                  माँ शारदे ! 
( हरिगीतिका छंद -- २८ मात्रा , चार चरण, चरणान्त में लघु -गुरु , तुकांत )


माँ शारदे आराधना ही  ज्ञान का आधार है |
माँ वाग्देवी,वीणा-वादिनि ज्ञान का भण्डार है |
माता सरस्वति,मातु वाणी ज्ञान का आगार है |
मातु अर्चन-साधना ही साहित्य का संसार है ||



हम  हैं शरण में आपकी माँ ज्ञान के स्वर दीजिए |
सुख-शान्ति का वातावरण जग में रहे वर दीजिए |
कवि हों सुहृद समर्थ सात्विक सौख्य स्वर परिपूर्ण हों |
साहित्य हो सुंदर शिवं सत-तथ्य शुचि  सम्पूर्ण हों ||

 

मंगलवार, 7 जून 2011

मुक्त छंद कविता ...डा श्याम गुप्त ....

मन के अंतरतम में ,
जब भाव-
उन्मुक्त बहते हैं,
स्वच्छंद, स्वतंत्र,
भावना की, सत्य की,
ऊंची उड़ान लिए;
विकास पथ की ओर
अग्रसर होने को ;
मानव मन के, 
संसार के,
दर्शन, ज्ञान विज्ञान को-
ऊंचाई देने को |

आस्था अमरता आत्मा व-
तत्व दर्शन  की व्याख्या के लिए ,
काव्य को,
कालजयी बनाने को |

तब कविता होजाती है, मुक्त-
छंद से,
छंद भव जाल से,
छन्द संसार से |
और बन जाती है-
छंद मुक्त,
मुक्त छंद कविता |

कवि को भरना होता है,
गागर में सागर |
कहानी होती है,
बिना लाग लपेट 
सीधी सच्ची ,
वैज्ञानिक ,
तत्व व्याख्या ;
लघुता में विभुता भरती हुई |

नहीं रहता है जहां स्थान ,
छन्द बद्धता,
अलंकार व तुकांतकी विभुता, व-
अगत्यात्मकता का |

एक ही कथन को-
उपमा रूपक उत्प्रेक्षा से , सजाकर-
बार बार कहने का |
पिष्ट-पेषण करने का |

इसीलिये-
श्रुति, संहिता, सामगान व-
मुक्त नज्में ,
अप्रतिम व अमर -
गेयता लिए हुए भी --
मुक्त छंद हैं ||