साहित्य की गुणवत्ता व हिन्दी भाषा की सर्वतोमुखी प्रगति के लिये समर्पित ----
शुक्रवार, 15 अगस्त 2014
मंगलवार, 22 अप्रैल 2014
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन -अठारह ( अंतिम)...कृष्ण लीला कौ तत्व--- ....डा श्याम गुप्त
मेरे नवीनतम प्रकाशित ब्रजभाषा
काव्य संग्रह ..."
ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ
गीत,
ग़ज़ल,
पद,
दोहे,
घनाक्षरी,
सवैया,
श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि मेरे ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में
प्रकाशित की जायंगी ... ....

कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का
संग्रह )
रचयिता ---डा श्याम गुप्त
--- सुषमा गुप्ता
प्रस्तुत है ...अंतिम ..भाव-अरपन ..अठारह ...कृष्ण -लीला कौ तत्व ( नौ लीलाओं का तात्विक अर्थ..कुण्डली छंदों में ).... दो लीलाएं प्रस्तुत हैं....सुमन १ ..... गौधन चोरी....
माखन की चोरी करें नित प्रति नंदकिसोर ,
कछु खावें कछु फैकिहें, मटुकी दैवें फोर |
मटुकी दैवें फोर, सखनि संग घर घर जावें ,
चुपकें मटुकी फोर, सबहि गोधन फैलावें |
देहें यही संदेसु, श्याम' समुझें ब्रजबासी ,
आपु बनें बलवान, दीन हों मथुरावासी ||
गोकुल बासी का गए, अरथ कारने भूलि |
माखन दूध नगर चलौ, गांवन उडिहै धूलि |
गांवन उडिहै धूलि, गाँव सगरो है भूखौ,
नगर होयं संपन्न, खायं हम रूखौ-सूखौ |
गागर दैहैं फोरि, श्याम सुनिलें ब्रजवासी ,
जो मथुरा लेजावै, गोधन गोकुलवासी ||
सुमन -३..चीर हरण ...
चीर मांगि रहीं गोपियाँ करि करि बहु मनुहारि ,
पैठीं काहे नीर सब , सगरे बसन उतारि |
सगरे बसन उतारि , लाज कैसी अब मन में ,
सोई आत्मा मो में, तो मेंहु सकल भुवन में |
कन कन मैं ही बसौ, है मेरौ ही तनु नीर,
मोसौं कैसी लाज लें आइ किनारे चीर ||
उचित नाहिं व्यौहार ये, नाहिं सास्त्र अनुकूल,
नंगे होय जल में घुसौ, मरजादा प्रतिकूल |
मरजादा प्रतिकूल, श्याम नै दियो ज्ञान यह,
दोनों बांह उठाय, बचन सब देउ आजु यह |
करहिं समरपन पूर्ण, लगावें मोही में चित,
कबहुँ न होवै भूल, भाव यह समुझें समुचित ||
कोऊ रहौ न देख अब, सब है सूनौ सांत ,
चाहे जो मन की करौ, चहुँ दिसि है एकांत |
चहुँ दिसि है एकांत, करौ अब पाप-पुण्य सब ,
पर नर की यह भूल, देखिहै सदा प्रभू सब |
कन कन बसिया ईश, हर जगह देखे सोई,
सोच समुझ कर कर्म, न प्रभु ते छिपिहै कोई ||
-----इति---- ----- ब्रज बांसुरी ....डा श्याम गुप्त की ब्रजभाषा रचना....
शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन - सत्रह ...नव-गीत ..कविता कविता खेलें ....डा श्याम गुप्त
मेरे नवीनतम प्रकाशित ब्रजभाषा
काव्य संग्रह ..."
ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ
गीत,
ग़ज़ल,
पद,
दोहे,
घनाक्षरी,
सवैया,
श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि मेरे ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में
प्रकाशित की जायंगी ... ....

कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का
संग्रह )
रचयिता ---डा श्याम गुप्त
--- सुषमा गुप्ता
प्रस्तुत है .....भाव-अरपन ..सत्रह...नवगीत ....१.कविता कविता खेलें
आऔ हम सब मिलिकैं ,
कविता कविता खेलें ||
छंद औ अलंकार में भूलें
विषय व्याकरन भाव |
लच्छनि बारी भासा होय तौ
का अनुभाव-विभाव |
भाँति भांति के उपमा रूपक,
गढ़िकें ऐसे लावैं |
जन जन की कहा बात,
नामधारी न समुझि पावैं |
नए नए बिम्बनि कौं ढूंढें ,
मिलिकैं पापड़ बेलें ||
आदि मध्य औ अंत में-
ना होय कोऊ लाग-लपेट |
छत्तीस व्यंजन ठूँसि कै बस-
भरिदें कविता कौ पेट |
ये दुनिया है संत्रासनि की ,
रोनौ-गानौ गायौ |
कवि तौ सुकवि औ समरथ है ,
कहा सुन्दर गीत सुनायौ |
का सारथकता, सामाजिकता,
सास्तर ज्ञान कौं पेलें ||
कम्प्युटर जुग में सब्दन के,
नए निकारें अर्थ |
कोऊ पूछै बतलाय डारें ,
सबके अर्थ -अनर्थ |
सुनें चुटकियाँ आज ,
हंसें रोवें घर जायकें |
जासौं पूछें अरथ,
वोही रहि जावै झल्लाय कें |
घर जायकें सब्दावलि ढूंढें ,
सब्दकोस कौं झेलें ||
काऊ बड़े मठाधारी कौं
चलौ पटाय डारें |
पूजा अरचन करें,
आरती करें मनाय डारें |
काऊ तरह औ कैसे हूँ ,
बस जुगति-जुगाड़ करें |
पुरस्कार मिलि जावै ,
औ सब जै जैकार करें |
काऊ तरह ते छपवाय डारें ,
बाजारनि में ठेलें ||
२.भरी उमस में...
आऔ आजु लगावैं घावनि पै
गीतनि के मरहम |
मन में है तेज़ाब भरौ
पर गीतनि कौ हू डेरौ |
मेरे गीतनि में ठसकी है,
दोस नांहि है मेरौ |
मेरौ अपनौ काव्य-बोधु है,
आपुनि ठनी ठसक है |
मेरी आपुनि ताल औ धुनि है,
आपुनि सोच-समुझि है |
भरी उमस में कैसें गावें
प्रेम प्रीति प्रीतम ||
जो कछु देखौ सोई कहतु हौं
झूठौ भाव है नाहीं |
जो कछु मिलौ सोई लौटाऊँ
कछु हू नयौ है नाहीं |
हमकों थी उम्मीद
खिलेंगे इन बगियन में फूल |
पर हर ठौर ही उगे भये हैं
कांटे और बबूल |
टूटि चुके हैं आजु समय की
सांसनि के दम-ख़म |
आओं आजु लगावैं घावनि पै
गीतनि के मरहम ||
रविवार, 13 अप्रैल 2014
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन -सोरह --सवैया छंद --सुमन -३.. श्याम सवैया छंद (ब)..जन्म मिले यदि... .डा श्याम गुप्त ...
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन -सोरह --सवैया छंद -सुमन ३-श्याम सवैया छंद (ब)..जन्म मिले यदि.....
मेरे नवीनतम प्रकाशित ब्रजभाषा
काव्य संग्रह ..."
ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ
गीत,
ग़ज़ल,
पद,
दोहे,
घनाक्षरी,
सवैया,
श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि मेरे ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में
प्रकाशित की जायंगी ... ....

कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का
संग्रह )
रचयिता ---डा श्याम गुप्त
--- सुषमा गुप्ता
प्रस्तुत है .....भाव-अरपन .. सोरह,,,सुमन ३-श्याम सवैया छंद...(वर्ण गणना ...छ पंक्तियाँ )...(ब)..जन्म मिले यदि.....
जन्म मिलै यदि मानुस कौ, तौ भारत भूमि वही अनुरागी |
पूत बड़े नेता कौं बनूँ, निज हित लगि देश की चिंता त्यागी |
पाहन ऊंचे मौल सजूँ, नित माया के दर्शन पाऊं सुभागी |
जो पसु हों तौ स्वान वही, मिले कोठी औ कार रहों बड़भागी |
काठ बनूँ तौ बनूँ कुर्सी, मिलि जावै मुराद मिले मन माँगी |
श्याम' जहै ठुकराऊं मिले, या फांसी या जेल सदा को हो दागी ||
वाहन हों तौ हीरो होंडा, चलें बाल-युवा सबही सुखरासी |
बास रहे दिल्ली -बैंगलूर, न चाहूँ अजुध्या मथुरा न कासी |
चाकरी प्रथम किलास मिले, सत्ता के मद में चूर नसा सी |
पत्नी मिलै संभारै दोऊ, घर-चाकरी बात न टारै ज़रा सी |
श्याम' मिलै बँगला-गाडी, औ दान-दहेज़ प्रचुर धन रासी |
जौ कवि हों तौ बसों लखनऊ, हर्षावै गीत-अगीत विधा सी ||
लेबल:
जन्म मिले,
ब्रज बांसुरी,
लखनऊ,
श्याम सवैया छंद
सोमवार, 7 अप्रैल 2014
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन -सोरह --सवैया छंद --सुमन -२...पंचक श्याम सवैया ...... ....डा श्याम गुप्त ...
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन -सोरह --सवैया छंद --सुमन -२...पंचक श्याम सवैया
मेरे नवीनतम प्रकाशित ब्रजभाषा
काव्य संग्रह ..."
ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ
गीत,
ग़ज़ल,
पद,
दोहे,
घनाक्षरी,
सवैया,
श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि मेरे ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में
प्रकाशित की जायंगी ... ....

कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का
संग्रह )
रचयिता ---डा श्याम गुप्त
--- सुषमा गुप्ता
प्रस्तुत है .....भाव-अरपन .. सोरह,,,सुमन -२..पंचक श्याम सवैया ... ( वर्ण गणना ..पांच पंक्तियाँ )..प्रीति वही जो होय लला सौं जसुमति सुत कान्हा बनवारी |
रीति वही जो निभाई लला हैं दीननि के दुःख में दुखहारी |
नीति वही जो सुहाई लला दई ऊधो कौं शुचि सीख सुखारी |
सीख वही दई गोपिन कौं जब चीर हरे गोवर्धन धारी |
जीत वही हो धर्म की जीत रहें संग माधव कृष्णा मुरारी ||
शक्ति वही जो दिखाई कान्ह गोवरधन गिरि उंगरी पै धारो |
युक्ति वही जो निभाई कान्ह दुःख-दारिद ग्राम व देश को टारो |
उक्ति वही जो रचाई कान्ह करो नर कर्म न फल को विचारो |
भक्ति वही जो सिखाई कान्ह जब ऊधो को ज्ञान अहं ते उबारो |
तृप्ति वही श्री कृष्ण भजे भजे राधा-गोविन्द सोई नाम पियारो ||
शनिवार, 5 अप्रैल 2014
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन -पंद्रह --दोहे ...... ....डा श्याम गुप्त ...
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन -पंद्रह --दोहे ...... ....डा श्याम गुप्त ...
मेरे नवीनतम प्रकाशित ब्रजभाषा
काव्य संग्रह ..."
ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ
गीत,
ग़ज़ल,
पद,
दोहे,
घनाक्षरी,
सवैया,
श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि मेरे ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में
प्रकाशित की जायंगी ... ....
कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का
संग्रह )
रचयिता ---डा श्याम गुप्त
--- सुषमा गुप्ता
प्रस्तुत है .....भाव-अरपन ....पंद्रह---दोहे....दोहे....नीति के....
जप ताप भगति न जानहूं,नहीं मैं वंदन ध्यान,
माँ तेरौ ही अनुसरन , मेरौ सकल जहान |
श्याम पूत हो एक ही,होवै साधु सुभाव ,
कुल आनंदित ह्वै रहै, चाँद चांदनी भाव |
सदाचार की थापना सास्त्र अरथ समुझाय ,
आपु करे सद आचरन , सो आचार्य कहाय |
नर नारी कौ द्वन्द तौ , है आदिम आचार ,
पर तिरिया मन टे खुले, मानुस कौ व्यौहार |
वेद सास्त्र औ धरम रत, निज की नहिं पहचान,
जैसें करछी पाक में, सकै न रस कौं जान | .........
नव नीति दोहे .....
मां तेरे ही चित्र पै, नित प्रति पुष्प चढ़ाउं,
मिसरी सी वानी मिले, मंत्री पद पाजाउं |
रोटी दो ही खाइए, सब्जी एक छिटांक,
श्याम ताहि के कारने , भटकें सुबहो सांझ |
चाहें जो कुल जनमियाँ , करनी जो हू होय ,
नेता मंत्री पद मिलौ ,मो सम भलौ न कोय |
तोकूं कछु भी नहीं मिले , सब कछु मेरौ होय,
जासं बढ़िकै जगत में, भली नीति का होय |
जन तौ तंतर में घिरौ , तंत्र भयो परतंत्र ,
चोर लुटेरे लूटिहैं ,डोलहिं भये सुतंत्र | ------
झूठ पुराण
तेल पाउडर बेचिहैं, झूठ बोलि इठलायं ,
बहुरि महानायक बने, मिलहिं लोग हरसायं|
साबुन क्रीम औ तेल कौ ,बेचीं रहीं इतराय ,
झूठे विज्ञापन करें , हीरोइन कहलायं |
झूठे वादे करि रहे, कुरसी में हथियाय ,
पांच बरस भूले रहें , सो नेता कहलायं |
झूठ बसौ संसार में, झूठे सब व्यौहार ,
या कलिजुग में झूंठ ही , सब सुक्खन कौ सार |
जो कोऊ कहि पाय जे, झूठी हमारे बात,
श्याम ताहि गुरु मानिकें ,चरन धूरि ले माथ | -----
क्रमश.....
लेबल:
झूठ पुराण,
दोहे,
नव-नीति,
ब्रज बांसुरी
बुधवार, 2 अप्रैल 2014
ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ...भाव अरपन चौदह.....बरवै छंद........ ....डा श्याम गुप्त ...
.
ब्रज
बांसुरी" की रचनाएँ .......डा श्याम गुप्त ...
आदि शक्ति पद पंकज, धरि ध्यान,
बरवै छंद कहै चहूं, मन सुख मान |
जीवन नौका पापमय,पार न जाय,
श्याम भजे घनश्याम को, पार लगाय |
नश्वर माया लूटिकै, चोर कहायं ,
राम नाम जो लूटिहौ, पाप नसायं|
तेल पाउडर बेचिकें, अति सुखु पायं,
जनता हीरो कहि रही, वे इठ्लायं |
अरथहीन तुकबंदी, हमहि न भाय,
कविता साँची करौ , मन हरखाय |
कत्था चूना पान मुख ,बहुरि सुहाय ,
अरबुद श्याम बने मुख,कछु न सुहाय |
बानी वृथा जो रसना, रस न बहाय ,
जगु जीते बानी सुघर, रस बरसाय |
कन कन में सो बसि रह्यो, ढूंढ न पे,
मंदिर मस्जिद चरच में, ढूंढन जाय |
पर पीरा में नहिं बहे, जे दृग नीर,
कहा श्याम दीदा धरे, जो बे पीर ||
मेरे नवीनतम प्रकाशित ब्रजभाषा
काव्य संग्रह ..."
ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ
गीत,
ग़ज़ल,
पद,
दोहे,
घनाक्षरी,
सवैया,
श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि मेरे ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में
प्रकाशित की जायंगी ... ....
कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का
संग्रह )
रचयिता ---डा श्याम गुप्त
--- सुषमा गुप्ता
प्रस्तुत है .....भाव-अरपन .....चौदह.....बरवै छंद........आदि शक्ति पद पंकज, धरि ध्यान,
बरवै छंद कहै चहूं, मन सुख मान |
जीवन नौका पापमय,पार न जाय,
श्याम भजे घनश्याम को, पार लगाय |
नश्वर माया लूटिकै, चोर कहायं ,
राम नाम जो लूटिहौ, पाप नसायं|
तेल पाउडर बेचिकें, अति सुखु पायं,
जनता हीरो कहि रही, वे इठ्लायं |
अरथहीन तुकबंदी, हमहि न भाय,
कविता साँची करौ , मन हरखाय |
कत्था चूना पान मुख ,बहुरि सुहाय ,
अरबुद श्याम बने मुख,कछु न सुहाय |
बानी वृथा जो रसना, रस न बहाय ,
जगु जीते बानी सुघर, रस बरसाय |
कन कन में सो बसि रह्यो, ढूंढ न पे,
मंदिर मस्जिद चरच में, ढूंढन जाय |
पर पीरा में नहिं बहे, जे दृग नीर,
कहा श्याम दीदा धरे, जो बे पीर ||
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
