शनिवार, 16 जनवरी 2010

डा श्याम गुप्त की गज़ल--

               गज़ल 


पास भी है किन्तु कितने दूर है ।
आपकी चाहों से भी अब दूर हैं |


आप चाहें या नहीं चाहें हमें ,
आप इस प्यासी नज़र के नूर हैं |


आप को है भूल जाने का सुरूर ,
हम भी इस दिल से मगर मज़बूर हैं |


चाह कर भी हम मना पाए नहीं ,
आपसे समझे यह कि हम मगरूर हैं |

आपको ही सिर्फ यह शिकवा नहीं ,
हम भी शिकवे-गिलों से भरपूर हैं |


आप मानें या न मानें 'श्याम हम,
आपके ख्यालों में ही मशरूर हैं ||

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