गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

इन्द्रधनुष’ उपन्यास..अन्क ९....डा श्याम गुप्त....


इन्द्रधनुष ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास...पिछले अंक आठ   से क्रमश:......
                                                              
                                                                      अंक नौ  ...

                                 सोचते सोचते जाने कब नींद लग गयी सुबह किसी के झिंझोड़ने पर मैं जागा
             '  क्या है सुभद्रे ! सोने दो '
               ' उठो, मैं सुमि हूँ, केजी ! तुम ट्रेन मैं हो घर में नहीं '
               'ओह, मैं हडबडाकर उठा सुमि फ्रेश होकर दोनों हाथों में कप पकडे खड़ी हुई थी '
               ' गुड मार्निंग '   मैंने कहा|
                वेरी वेरी गुड है ये मार्निंग, तुम्हारे साथ कृष्ण, चलो काफी होजाय  
                हम दोनों ही हंस पड़े
               'तुम तो एक दम घोड़े बेचकर सोरहीं थी, बेफिक्र मैडम, ये ट्रेन है बैडरूम नहीं सुना नहीं है--
  "तेरी गठरी में लागा चोर , मुसाफिर जाग ज़रा "
                'प्रथम क्लास  ऐसी है, कौन चोर आता है  और गठरी में तो चोर जाने कब से लगा हुआ है ' , वह मुस्कुराई
               ' फिर भी यात्रा में इतना बेफिक्र नहीं सोना चाहिए ' मैंने सहज भाव में ही कहा
                'तुम थे तभी तो......'
                'इतना विश्वास है मुझ पर ?'
               ' क्या हुआ है तुम्हें ? पता भी है क्या कह रहे हो चलो काफी ख़त्म करो '
                ' अच्छा, स्त्री-पुरुष मित्रता पर अब तुम्हारे क्या विचार हैं ?'
               ' आगये अपनी पर उसने बाल संवारते हुए कहा , ' वही, स्वस्थ मित्रता होनी चाहिए। जब तक एक दूसरे के बारे में पूर्ण ज्ञान हो, नहीं होनी चाहिए एक दम ख़ास विश्वासी मित्र के अलावा किसी के साथ एकांत में जाना चाहिए घूमना एकांत में तो ख़ास मित्र के साथ भी नहीं टाइम-टैस्टेड मित्र के साथ अकेले जा सकते हैं, तुम्हारे जैसे ' उसने मुस्कुराते हुए कहा
                ' और मेरे जैसा विश्वासी  मित्र धोका दे तो ?'
                ' हरि इच्छा ! मेरा दुर्भाग्य, ईश्वरेच्छा पर किसका वश हमें तो अपना व्यवहार उचित प्रकार से करते रहना चाहिए, कि  " बैल मुझे मार  "   दुनिया के कार्य तो चलते ही रहेंगे वैसे तुम्हारे अपने मस्तिष्क  में तो यह बात कभी आई ही नहीं होगी ', वह खुलकर हंसी
                  ' आं....ss  आई नहीं होती तो  बात निकलती ही कैसेऔर  तुम्हारे अपने मस्तिष्क  में .....क्या मस्तिष्क  भी दो तरह के होते हैं मनुष्य के पास...एक अपना एक पराया ?'
                  ' हाँ, आई होगी पर दूसरों के लिए, अन्य के सन्दर्भ में  जब हम अपने लिए सोचें तो अपना स्वयं का मस्तिष्क  और अन्य लोगों के सन्दर्भ में सोचें तो सामाजिक मस्तिष्क  कार्य कर रहा होता है   तुम्हारे पास तो अवश्य ही दो हैं वह हास्य स्मित अधरों से बोलती गयी
                   ' वाह ! क्या नयी रिसर्च की है ' मैंने हंसते हुए सर हिलाकर कहा '
                   'कब तक दूसरों के लिए ही सोचते रहोगे, जीते रहोगे ?'  
                  ' हम सदा अपने लिए ही तो जीते हैं। मैं सदा ही तो यह कहता हूँ अच्छे बनने के लिए ही तो, कि लोग हमें अच्छा कहें, प्रशंसा करें , हम दूसरों के कार्य करते हैं  '
                   'वस्तुतः व्यक्ति की स्वयं अकेले की क्या स्थिति होती है ? हम वह होते हैं जो अन्य हमें कहते हैं, समझते हैं हम चाहे लाख तीसमार खां हों,यदि अन्य नहीं  समझते तो हम कुछ भी नहीं हैं  यह व्यवहारगत मूल संसारी तथ्य है वीतरागी की बात पृथक है परन्तु वीतरागी भी तो वही बन सकता है जिसने पहले राग को जाना हो तब त्यागा हो '
                   ' इसी प्रकार जैसे नारी की पिता, पुत्र, भाई , पति या मित्र के बिना कोई पहचान नहीं होती।  उसका नारीत्व कैसे सफल होगा ? उसी प्रकार पुरुष की भी स्थिति है। नारी, पत्नी, भगिनी, मां, पुत्री, मित्र के बिना कौन उसके पुरुषत्व को सराहेगा और क्यों अतः स्वयं को अच्छा साबित करने के लिए ही हम दूसरों पर कृपा उनके कार्य करते हैं '
                   ' मैं तुमसे ही तो नहीं जीत पायी, कृष्ण '
                   ' तो वैसे  तुमने विश्व-विजय कर लिया है, क्या !'
                  ' वह हंसकर रह गयी।  फिर बोली, ' अपने आस पास का संसार तो मैंने विजय किया ही है '
                  ' बड़ी  संसारी होगई हो तो सांसारिक समता समानता पर अब क्या विचार बने हैं तुम्हारे ?'
                   वह हँसने लगी, फिर बोली, ' सभी एक समान कैसे हो सकते हैं ? मैं प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रही हूँ, मेरे पास किराया देने को धन है ।क्योंकि मैंने परिश्रम साधना की है वह सड़क पर खड़ी भिखारिन मेरे बराबर कैसे हो सकती है वह अपने कर्मों के कारण वहां है, मेरे कारण नहीं   मनुष्य के कर्म ही यह फैसला करते हैं कि उसे कहाँ होना चाहिए   बस उसे परमार्थ-हित , स्वार्थ रहित कर्म करते जाना चाहिए '
                   ' क्या यह गर्व नहीं है ?'
                   ' यह आत्मविश्वास है, गर्व नहीं, कृष्णमुझे पता है तुम जानते हो   और गर्व करूंगी, वो भी केजी के सामने ?'  वह जोर से हंसी,  ' इसका यह अर्थ भी नहीं कि हम उस भिखारिन से घृणा करें या प्रताड़ित करें   यह ईश्वर का काम हैहमारा नहीं हम चाहें तो उसकी सहायता कर सकते हैं '
                  ' और जो लोग अपनी साधना-सिद्धि का दुरुपयोग करके, या  अवैध और अनधिकृत ढंग से कमाई करते हैं उनका क्या इस स्थिति से कोई सम्बन्ध है ?'
                  ' हाँ, अवश्य ही वे उसकी देश समाज के इस स्थिति के लिए दोषी हैं तभी तो भिखारी को एक पैसा दे देना या गरीब की सहायता कर देने वाला भारतीय स्वभाव यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्तियों के पाप-पूर्ण कार्यों का हम कुछ निराकरण करके अपने दायित्व की कुछ पूर्ति कर  रहे हैं और यदि जाने अनजाने उस स्थिति के लिए कहीं हम भी थोड़ा सा जिम्मेदार हों तो उसका प्रायश्चित '
                 ' और यदि स्वयं तुमको भी ऐसी परिस्थिति से दो-चार होना पड़े तो ?'
                 'वह भी मेरे कर्मफल के कारण होगा, कोई गिला-शिकवा नहीं। झेलना चाहिए '
                ' कहना बहुत आसान है', मैंने कहा 
                ' हाँ, सचमुच, पर कठिन कार्य आने पर ही तो इंसान निखरता है  वैसे कौन सा अच्छा कार्य सरल होता है ?'
               ओह, सुमि !  'यू आर स्टिल जीनियस '
               ' स्टिल !...'तो क्या मुझे उम्र के साथ कम अक्ल होते जाना चाहिए ? या तुम्हारा मतलब है तुमसे दूर रहकर ..'
                                " वह दूर भी  है पास भी है,
                                दिल के करीब रहता है 
                                जोशो जुनूँ को मेरे ,
                               कोई तो हवा देता है ।।"    
                                            मैंने उसे ध्यान से देखा  पच्चीस वर्ष बाद  की  सुमिवही तेज तर्रार आत्मविश्वास से युक्त गहरी आँखें , मर्यादित पहनावा, गरिमामय सौन्दर्य कनपटी पर झांकते समय की कहानी कहने को आतुर रुपहले बाल
                    ' क्या देख रहे हो ?'
                          " दिल ढूँढता है फिर वही सुमि वो रात दिन 
                          बैठे है तसब्बुर में जवाँ यादें लिए हुए ।।
                    ' तुम तो वैसे के वैसे हो, योगीराज !'
                                       

            **                              **                           **

                                              निर्धारित कार्यक्रमानुसार हम लोग चौपाटी, मैरीन ड्राइव आदि घूमते रहे भेलपूरी चाट आदि के वर्किंग लंच के बीच पुरानी यादें ताजा करते रहे   केरीयरपरिवार सभी के बारे में बातें होती रहीं  काव्य-संग्रह के अंश सुनकर पुरानी सुमि लौट आई थी   जम कर प्रशंसा समीक्षा करती रही  बोली -
                    'कुछ मुझे भी समर्पण करो '
                    ' सब तुम्हीं को अर्पण है, अब समर्पण की बात कहाँ ?'
                     हूँ, सुमि कहने लगी,  'सच कृष्ण, जब भी मैं उदास या डिप्रेस्सेड  होती हूँ  तो चुपचाप झूले पर बैठकर कालिज तुमसे जुडी यादों में खो जाती हूँ, जो  मुझमें पुनः जीवन नवीनता का संचार करती हैं   सच है, सुखद, सुहानी यादें बड़े सशक्त टानिक होती हैं   क्या मैं विभक्त व्यक्तित्व हूँ   तुम तो अपने बारे में कहते ही नहीं '
                     ' नहीं, सुमि ! तुम अभक्त, अनंत, परमसुखी व्यक्तित्व हो, और मैं भी '
                    ' हर बात का उत्तर है तुम्हारे पास और तुरंत ?' चलो अब कुछ सुना दो
                     हूँ, मैंने कहा, सुनो ----
                                             
                                                 " प्रियतम प्रिय का मिलना जीवन ,
                                                  साँसों का चलना है जीवन 
                                                  मिलना और बिछुड़ना जीवन ,
                                                  जीवन हार भी जीत भी जीवन ।।"       
                       सुमि सुनाने लगी ---
                                                   "प्यार है शाश्वत कब मरता है,                                            
                                                   
रोम  रोम में  रहता  है
                                                    अज़र अमर है वह अविनाशी,
                                                    मन में रच बस रहता है ।।"   
                        ' ये कहाँ से याद किया ?', मैंने पूछा
                        ' मैंने तुम्हारी हर पुस्तक खरीदी है '
                        ' ओह ! शायद एक अकेली तुम ही खरीदती हो मेरेी पुस्तकें ?’  हम दोनों हंसने लगे
                        ’ ये क्या  होगया है हमें केजीवह सेीरियस होकर बोली, ’  साहित्य में हमें कोई रूचि ही नहीं रह गयी है  संस्कृति में अध्यात्म में   सत्साहित्य आज कल पढ़ा ही नहीं जाता  स्कूल कालिज के बच्चे जादू की, चोर-उचक्कों की, फंतासी वाले अंग्रेज़ी  उपन्यास पुस्तकें पढ़ने में व्यस्त है सामान्य जनता कामर्शियल पेपर, चटपटे नाविल पढ़कर फैंक देने में लगी है अंग्रेज़ी नावेल हम लोग भी  पढ़ते थे, फ़िल्में भी देखते थे  पर साहित्यिक रचनाएँ -शर्त, प्रसाद, टेगोर, प्रेमचंद, गोर्की, निराला,महादेवी, पन्त , वर्ड्स वर्थ , शेली, कीट्स आदि को भी कितना पढ़ते थे  सिर्फ एकेडेमिक क्लासेज़ में ही नहीं, मेडीकल के कठिन अध्ययन के साथ भी '
                        ' आज चारों और सभी वर्गों में अंतर्द्वंद्व असंतुष्टि का यही तो कारण है कि उत्तम साहित्य के पठन -पाठन  का मार्ग अवरुद्ध होगया है।  साहित्य ही तो इतिहास, धर्म संस्कृति का प्रतिपादन करता है साहित्य क्या है ? यों ही नहीं होता काव्य में कोई कथा, कथ्य तथ्य मानव जीवन की कथाओं, ज्ञान-विज्ञान के समन्वित अनुभवों का निचोड़ होता है साहित्य, उनका इतिहास होता है साहित्य   इतिहास जाने बिना हमें अनुभवजन्य ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता हैइसी ज्ञान के होने से आज का युवा प्रौढ़ वर्ग सामाजिक मानवीय ज्ञान से अछूता रहता है और केवल कार्यात्मक, प्रोफेशनल दैनिक व्यवहारिक ज्ञान को ही ज्ञान मानकर  सब कुछ ज्ञाता   होने का भ्रम  पाले   रहता है   जीवन का मूल उद्देश्य दिशा पाकर अंतर्द्वंद्वों में घिरा रहता है या पलायनवादी, अति-भौतिकवादी बन जाता है मैंने विस्तार से कहा   'परन्तु त्रुटि भूल कहाँ हुई ?'  क्या  सारा दोष  आज की पीढी का ही है ?' मैंने शायद स्वयं से ही प्रश्न किया '
                          'भूल हमारी ही है केजी शायद उन्नति, विकास, भौतिकता की चकाचौंध शीघ्रातिशीघ्र फल प्राप्ति की दौड़ में एवं अंधाधुंध पाश्चात्य नक़ल करके बराबरी की होड़ में, सदियों की दासता के फलस्वरूप अपना गौरव, अपनी संस्कृति व् इतिहास भूले हुए हम लोग - अपनी स्वयं की अस्मिता, भारतीय भाव, भाषा संस्कारों को संभल कर नहीं  रख पाए तथा आगे आने वाली पीढी के अनुकरण अनुसरण के लिए  एक उदाहरण प्रस्तुत करने में असफल रहे  जो राष्ट्र देश एक लम्बी राजनैतिक  गुलामी में भी सिद्धांततः अपनी संस्कृति धर्म बचाए हुए था ; राजनैतिक स्वतन्त्रता मिलने पर  पाश्चात्य रंग-ढंग विश्व-राजनीति का शिकार होकर सांस्कृतिक रूप से गुलाम होगया   सरकार, समाज बौद्धिक संसार में सभी में वही भारतवासी हैं तो वही स्थिति है ', सुमि ने अपना विचार व्याख्यायित किया '
                              ' और यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो दर्पण में झांके बिना समाज कैसे दिखाई देगा उत्तरोत्तर विकास केी से सीढी कैसे बनेगी ? बिना इतिहास शास्त्र, सत्साहित्य के कोई भेी  समाज राष्ट्र कब उन्नत हुआ है ?’ सुमि ने पुनःकहा
                                                                                              
                         'पर साहित्यकार भी आज कहाँ अपना दायित्व निभा रहे हैं   सुरा सुन्दरी, कार, बंगलों के लिए अंधी दौड़ में शामिल होकर, सोफों पर बैठकर प्रेमगीत,गरीबी, पतन,रोंर-गाने के, सरकार समाज विरोधी कथानक गीत सिर्फ लिखकर बिना किसी समाधान प्रस्तुति के...वे क्या कहना चाहते हैं?   व्यर्थ के व्यंग्य, द्विअर्थी हास्य, क्लिष्ट भाषा, पान्डित्य-प्रदर्शक कवितायें, पुराने घिसे-पिटे गुरुडम, अखाड़े बाज़ी, गली गली में खुलती साहित्यिक संस्थाएं, जोड़ तोड़ कर डिक्शनरी रखकर लिखने वाले कवि, टुट पूंजियों से लेकर बड़े बड़े समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशक सिर्फ कमाई का ज़रिया ढूँढने में लगे हैं। साहित्य --अर्थात समाज स्वयं साहित्य का व्यापक हित कौन सोच रहा हैसूर तुलसी कबीर जैसा उपयोगी, व्यवहारिक साहित्य कौन रच रहा है। क्या प्रकाशकों को, बुक सेलरों को, मुद्रकों को अधिकार है कि वे तय करें साहित्य क्या कैसा हो   भाषा साहित्य कैसा हो।  क्या कौन छपना चाहिए ?'  मैंने पूछा 
                         नहीं, सुमि कहने लगी ,' उन्हें बस छापना, प्रकाशन बेचना चाहिए, उन्हें  सही, शुचि सत्साहित्य के प्रकाशन के उन्नयन पर ध्यान देना चाहिए साहित्य की दिशा गुणवत्ता पर विश्व-विद्यालय के सम्वद्ध शिक्षकों, विद्वानों विज्ञ- साहियाकारों का मंतव्य ही मान्य होना चाहिये, जहां आर्थिक दृष्टि भाव हो
                           आज समाचार पत्रों के संवाददाता, पत्रकार, सम्पादक, मालिक, प्रकाशक, पुस्तक-विक्रेता आदि साहित्य के दिशावोधक बन गए हैं जो मूलतः शासन-प्रशासन की अज्ञानता, अनुभवहीनता, उदासीनता अक्षमता से होता है आर्थिक दृष्टि के साथ गुणवत्ता का भाव रखना दुष्कर है प्रकाशक क्या छाप रहे हैं, कैसा क्यों छाप रहे हैं उस पर विज्ञ-समिति का नियंत्रण समय समय पर विचार विमर्श होना चाहिए
                          ' और यदि विज्ञ समिति भ्रष्टाचार में लिप्त होजाय तो '
                         ' सही है, यह होता है, हो सकता है ' सुमि बोली,' परन्तु गुणवत्ता की मात्रा तो अधिक रहेगी। पूर्णता के लिए तो फिर घूमकर हम वहीं पहुंचते हैं। मानव मात्र को ही सच्चरित्र होना पडेगा, तभी सब कुछ ठीक होगा "सौ बातों की एक बातहज़ार प्रश्नों का एक उत्तर '
                            और यह कैसे होगा ? मैंने पुनः पूछा
                             आत्मानुशासन से, अन्य चाहे कुछ भी करते हों परन्तु हम असत्याचरण नहीं करेंगे.....की भावना से हाँ, यह दुष्कर कार्य है पर असंभव नहीं हम प्रारम्भ तो करें ....कहीं से भी....सभी अपने अपने क्षेत्र में ....घर से...सत्साहित्य से.....जैसे तुम....वह हंसते हंसते कहती गयी '
                 ” क्या सोच रहे हो?
                   ’आँ.....s  s.. मुझे तुम्हारा कालिज का पहला दिन भाषण अचानक याद गया
                   ’अब छोडो भी मत याद  दिलाओ 
                  ”चलो कुछ और बात की जाय
                   हाँ, तुम्ही छेड़ो, सुमि बोली
                   ’अच्छा बताओ, आज बहु प्रचारित मनुवादी व्यवस्था पर तुम्हारे क्या विचार हैं
                                          'आधारभूत रूप में सवर्ण और अवर्ण का अर्थ मैं यह लगाती हूँ कि वर्ण का अर्थ होता है 'रंग' . अर्थात विविधता अतः जिसके व्यवहार में , बोलचाल-कार्य में रंग अर्थात वैविध्य  है , गत्यात्मकता है, प्रगति है, युक्ति-युक्तता है..वह समाज 'सवर्ण' तथा जिसमें रंग नहीं हैं अर्थात व्यवहार-विविधता, यथायोग्य निर्णायकता नहीं, गति नहीं वरन एकरूपता , जड़ता, जड़ पशुओं जैसी समूह-प्रकृति सोच है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता वैविध्य चिंतन नहीं वह 'अवर्ण' है   अज समस्या यह नहीं कि मनुवादी सवर्ण एनी पर राज कर रहे हैं अपितु आज राजनैतिक दल शासन मनुवादी सवर्ण व्यवस्था भूल चले है और सभी समूहवादी, जड़वादी अवर्ण व्यवस्था के पोषक हैं यहाँ जाति धर्म का अधिक अर्थ महत्त्व नहीं है।
                      मैं उसे एकटक देखता रहा तो सुमित्रा बोली ,' इसे क्या देख रहे हो, क्या ये विचित्र व्याख्या है?'
                     ' हाँ, सो तो है ही, नवीन व्याख्या है '
                      'पर मुझे विश्वास है कि तुम इसपर पहले ही सोच चुके हो  '
                       'सच '
                       'क्या मैं गलत हूँ ?'
                        नहीं, मैं तुमसे सहमत हूँ  अच्छा मैडम! ये किटी- पार्टी  के बारे में भी स्पष्ट करें ' मैंने बात को आगे बढाया 
                       किटी-पार्टी विदेशी.......अरे! कहीं तुम अपने कथा-उपन्यास आदि की सामग्री तो एकत्र नहीं कर रहे हो ' उसने अचानक आँखों में झाँक कर पूछा  मैं मुस्कुराया तो कहने लगी, चलो बताये देती हूँ, क्या याद करोगे  क्या पता मेरी ये बातें ही तुम्हारे उपन्यास, काव्य आदि साहित्य में आकर अमर होजायं और मैं भी  फिर कल मिलें मिलें  क्या पता '
                         किटी पार्टी  भी तमाम अन्य रीतियों की भाँति विदेशी नक़ल है। भई, पहले भी अपने यहाँ स्त्रियाँ खाली समय में आपस में उठती बैठती थीं   एक दूसरे के घर जाना गीत, संगीत, नृत्य, नाटिका, वादन, चित्रकला, कढाई-सिलाई-बुनाई , कला-कौशल, हंसने-बोलने में समय व्यतीत करती थीं। आपस में सहयोग भी समाज सेवा भी इन कला-कौशलों का व्यवसायीकरण होजाने के बाद यही साडी-गहनों की चर्चा में परिवर्तित होगया, परन्तु लेन-देन से कोई अभिप्राय: नहीं था। क्योंकि आजकल हर कार्य पैसों से एवं धन एकत्र करके किया जाने लगा है वही 'किटी ' है जो धन के दिखावा नंबर दो के काले पैसे के खर्च का जरिया बन गया है और मनोरंजन सिर्फ नाम को उसका सह-जरिया '

                                           
                                   अच्छा केजी, तुम्हें पता है डा. सरला भारद्वाज  इन्डियन मेडीकल कोंसिल  की अध्यक्ष बन गयी हैं
             ' डा. सरला ...अपने बैच में तो कोई नहीं थी।'
             नहीं, पर याद करो, देखें कुछ सुधार हुआ है या नहीं  कहाँ तक पहुँच पाते हो।  वे जनरल सर्जन हैं 
              ' अरे वही , एम. एस. जनरल सर्जरी में किया था और देश की पहली महिला सर्जन हैं  सीनियर बीच की  डा. भारद्वाज '
               हाँ, वही  वाह ! याददास्त सुधर गयी है, क्या बात है  अभी कल की ही तो बात लगती है जब कालिज में गरमा-गर्म खबर फ़ैली थी की कालिज के इतिहास में पहली बार किसी महिला डाक्टर ने एम् एस शल्य चिकित्सा में करने का निश्चय किया है और वह भी ग्रेजुएशन में टापर ने। जो कई पदक प्राप्त हैं
               और हम लोग आउट-डोर वार्ड में विशेष रूप से देखने जाते थे कि वे कैसे काम कर रही हैं , कौन बोल्ड लेडी हैं
                कालिज अस्पताल में काफी समय तक बहस चलाती रही कि वे सर्जरी में चल पाएंगी कि नहीं कई बार तो लडके-लड़कियों में काफी तकरार भी  हुई कि ' हम किसी से कम नहीं '- और तुम चमगादड़ की भाँति पाले बदलते रहते थे ' वह हंसकर कहने लगी , ' फिर मुझे  बचाव करना पड़ता था '
                 हाँ, हाँ, मैंने टालते हुए कहा , ' पर आगे अन्य महिला डाक्टरों ने कहाँ अधिक दिलचस्पी दिखाई इस  क्षेत्र  में   वही अपने स्त्री -चिकित्सा बाल-चिकित्सा या पेरा-मेडीकल विषयों में ही जाती  रहीं
                 परन्तु  'इक  दिया है बहुत रोशनी के लिए'  उन्होंने तो पीछे मुड़कर नहीं देखा  देश की प्रथम महिला सर्जन बनीं, दिल्ली विश्व-विद्यालय की 'डीन ' और आज सर्वोच्च पद पर   देश-विदेश में खूब नाम कमाया  अब तो तमाम महिला चिकित्सक हैं इस फील्ड में '
                   ' बड़ी  अच्छी  धमाकेदार खबर है, सुमि !'
                   'मुझे पता था तुम सुनकर खुश होगे सुमि मुस्कुराकर कहने लगी,' उस दिन भी वो खबर मैंने ही दी थी सबसे पहले तुम्हें   याद है जब भी एसी कोई नयी बात होती या सुनते तो तुम गुनगुनाया करते थे....

                               " मोड़ जायेंगे जमाने की कई राहों को,
                                करके नए रंग जमाने की नज़र जायेंगे 
                 ' वाह ! तुम्हें याद है अभी तक ये शेर मैंने आश्चर्य से कहा
                 कैसे और क्यों भूलूँक्या सबसे पहले मेरे लिए नहीं कहा गया था पर अब तो वह पूरी ग़ज़ल होगई होगी सुनाओ , वह आग्रहपूर्वक बोली मैंने सुनाया --
                                  " अपने अशआर में हमने  तो संजोया है जहां ,
                                    मुड़के  चल देगा  मेरे साथ  जहां  जायेंगे  
                              
                                   बात मेरी  सुने  सारा ज़माना  चाहे ,
                                   चन्द जाहिद तो सुनेंगे सुधर जायेंगे

                                   बात तेरी हो मेरे प्यार, मेरे देश अगर,
                                   हम तो दीवानगी की हद से गुज़र जायेंगे

                                  मेरी यादों में लग पाएंगे मेले लेकिन,
                                 तेरी गलियों में किये याद मगर जायेंगे 

                                 केजी' इक रोज़ चले जायेंगे ज़हाँ से लेकिन ,
                                बन के खुशबू तो ज़माने में बिखर जायेंगे ।।
            
                  ' बस- बस चुप करो, क्या कह रहे हो   क्या पता कब कहाँ और कौन पहले जाय ', वह बोल पडी
                  'कब जा रही हो  हो ? '  मैंने पूछा तो मुस्कुराती हुई कहने लगी ...
                                  " बात मीठी हो या तीखी हो, तेरी हो अगर,
                                   तेरी हर बात पै चाहोगे तो मर जायेंगे 

                                   आपने पूछा है कि अब आप चले जायेंगे ,
                                   आप कह देंगे कि रुक जाओ तो रुक जायेंगे  "

                        और वह कोहनी रेत पर टिकाकर, हाथों पर चेहरे  को रखकर मुस्कुराने लगी   बोली , ' आज शाम को चार बजे की फ्लाईट से जारही हूँ, यहाँ का कार्य जल्दी समाप्त होगया  '
                                   " रास्ते तय हैं, और तय हैं मंजिलें भी केजी,
                                    अपनी अपनी राह यूंही साथ चलते जायेंगे "......मैंने कहा तो हंसकर बोली,....वाह ! क्या बात है, अभी भी दम है।  हाथ चूमने को, पैर छूने को दिल चाहता है तुम्हारे तो केजीवह दोनों हाथ जोड़कर, सर झुका  कर कह गयी......
                                       " दिल की लगी इस दिल्लगी पर 
                                           क्यों मर जाये कोई "
                   और वह खिलखिलाकर  हंसी  तो  हंसती ही चलेी गयी
                   दो बज रहे हैं, मैंने याद  दिलाया
                  ओह! वह चुप होते हुए बोली , ' समय कितनी जल्दी बीत गया ?'
                  ’एयरपोर्ट छोड़ने चलूँ
                  ' हाँ '
                               हम  टैक्सी  लेकर सुमि के गेस्ट हाउस होते हुए एयरपोर्ट पहुंचे   सुमि ने   पूछा--
                  ' याद करोगे ?'
                   ’नहीं’ , मैंने कहा ---
                                      " दिल में ही सूरत बसी है यार की ,
                                       जब ज़रा  गर्दन  झुकाई   देख  ली।"
                   लाउंज के कोने में खड़े होकर अचानक सुमि ने कहा, " मुझे किस करो कृष्ण ! "
                 ” क्या कह रही हो, क्या पागलपन है सुमि !’  मैंने आश्चर्य से कहा
                  'आज मैं ही कह रही हूँ  यही कहा था तुमने पहली मुलाक़ात में ?'  वह सोचती  हुई बोली 
                           
                             मैंने होठों से उसके  माथे को छुआ तो वह खिलखिलाकर हंस पडी   'मैं क़र्ज़ मुक्त हुई केजी अब चैन से जा सकूंगी, कहीं भी वह गहराई तक मेरी आँखों में झांकते हुए बोली
                 'और अब तक का सूद मैंने हंसते हुए कहा
                ’अगले जन्म में
                ’आशा है अगले जन्म में भी हम पक्के मित्र रहेंगे ’  मैंने अनायास ही कहा
                'नहीं, पति-पत्नी '
               ’ व्हाट ?... क्या !’
               'अगले जन्म की प्रतीक्षा करो, केजी '   और वह तेजी से बोर्डिंग लाउंज में प्रवेश कर गयी 

                        ------------ अंक नौ समाप्त , क्रमश अंक दस ....अगली पोस्ट में
                    
  
                                   
                
    
                 

                                    

                           
   

रविवार, 1 अप्रैल 2012

इन्द्रधनुष.....अंक आठ -----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....



                           


   
                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास....पिछले अंक  से क्रमश:......
                                                     अंक  आठ 

                 

                                 लाइब्रेरी के मैगजीन सेक्शन में- मैं और एके जैन यूंही बैठे पन्ने उलट रहे थे कि अचानक हवा में तैरती हुई आवाज़ आयी --
                          "   जब जब बहार आये , 
                            और फूल मुस्कुराए, 
                            हमें तुम याद आये,
                            हमें तुम याद आये ।। "
                मैंने सिर उठाकर देखा  तो सुमित्रा अपनी मित्र साधना वर्मा के साध गुनगुनाती हुई सीढियां उतर रही थी ।   जैन के अचानक हंस पड़ने से दोनों चौंकी और चुप होकर जाने लगीं ।
                मैंने पूछा , ' सुमि, क्या दिल्ली की याद आरही है ?' 
                हाँ, वह बोली, पर मैं तो वहां होती हूँ तब भी यही गीत गुनुगुनाती हूँ ।  जैन व साधना एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।  दोनों के चले जाने पर जैन ने पूछा , ' इसका क्या अर्थ हुआ ?'
                पता नहीं, सुमि  अच्छा गाती है ।  
                ' ये तो सभी जानते हैं ।'
                चलो क्लास में चलते हैं, मैंने उठते हुए कहा ।   
                         
         **                 **                    **
                                     
                          "ग्रामीण व सामुदायिक  चिकित्सा"  कार्यक्रम के अंतर्गत हम लोग एक सुदूर ग्राम में घर घर जाकर सामुदायिक स्वास्थ्य, स्त्री व वाल स्वाथ्य पर परामर्श व विभिन्न आंकडे एकत्रित करने के क्रम में टोली बनाकर भ्रमण कर रहे थे ।
                           सुनील कपूर ने चलते चलते कहा,  ' क्या बात है, आठ प्रिगनेंसी, छ: डिलीवरी,  दो जराउली     ( टेटनस )  में मर गए,  दो पीलिया से।  बचे दो- एक को सूखा रोग है और एक अभी गोद में है । क्या आंकड़े हैं ।' 
                 ' अधिकतर घरों में यही हाल है ।' सुमित्रा कहने लगी . ' अशिक्षा , गरीबी, भूख, पिछडापन फिर फिर अशिक्षा ...गरीबी ...ये दुश्चक्र कब ख़त्म होगा !'
               ' हम सब लोग कहाँ तक समझायेंगे इन सब को। क्या कुछ लोगों को बताकर सब कुछ ठीक हो जाएगा ?'  कुसुम ने कहा ।
              ' कितनी गन्दगी, कीचड  व बदबूदार नालियां हैं  यहाँ ? रंजन ने नाक-मुंह सिकोड़कर, रुमाल नाक पर रखते हुए कहा , ' कौन दोबारा आना चाहेगा यहाँ । क्या फ़ायदा व्यर्थ घूमने का ।  ये तो सुधरने वाले हैं नहीं ।'
               ' इसी सब के डाटाकरण व उपायीकरण के लिए हम सब घूम रहे हैं यहाँ । यदि बुद्धिवादी, प्रोफेशनल, पढ़े-लिखे लोग, शासन- पदस्थ लोगों को यह पता ही नहीं होगा तो ये सब कमियाँ, बुराइयां दूर कैसे होंगी ? इसके उपाय कैसे सूझेंगे । मैं तो चाहता हूँ कि प्रत्येक मेडीकल व अन्य कालेजों के व संस्थानों के छात्रों को अनिवार्यतः बारी बारी से गांवों में जाना चाहिए । यदि हम ही पहल नहीं करेंगे तो कैसे सुधरेगी यह हालत ?' मैंने कहा ।
               'कौन दोबारा आयेगा यहाँ ? तुम्हीं आना कीचड व गन्दगी में घूमने यहाँ । सतीश रंजन ने नाक सिकोड़ते हुए कहा ।
               हाँ.. हाँ भैया, हम तो पैदा यहाँ हुए हैं तो निभायेंगे ही । अपना तो उद्देश्य भी यही है । ' जीना यहाँ मरना यहाँ,  इसके सिवा और जाना कहाँ ?"  मैंने सुमित्रा की और देखते हुए मुस्कुराकर कहा ।
              ' मैं तुम्हारा इशारा समझ रही हूँ, अच्छी तरह ।' सुमित्रा बोली ।
              ' क्या समझी ?'
              'क्या समझते हो, गूढ़ बातें सिर्फ तुम ही कह-समझ सकते हो ? कोई और नहीं । '
             ' तुम्हारे बारे में तो न कभी मैंने एसा सोचा न कहा ।'
              ' ठीक है समय आने पर बताएँगे, हम क्या समझे ।'
             ' मैं कुछ समझा नहीं ।' रंजन ने आश्चर्य से कहा, ' एसी क्या बात है ?' 
             'कहाँ  व किन  बहसबाजों के चक्कर में फंस रहे हैं,  डा रंजन ।'  साधना  वर्मा बोली,'  आपको तो वैसे भी दोबारा नहीं आना है यहाँ । चलिए आगे बढिए ।'


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                                          स्त्री रोग चिकित्सा विभाग  में ड्यूटी के दौरान अधिकतर पुरुष -छात्र वार्ड में अधिक रुकने में रूचि नहीं लेते । अतः कोई भी छोटे मोटे  काम के बहाने अन्य विभाग या लाइब्रेरी में पढ़ते रहते हैं । इसी तरह गायब होने के पश्चात जब मैं विभाग में पहुंचा तो हाउस इंचार्ज डा. रेनू ने पूछा, ' डाक्टर साहब , इतने समय से कहाँ थे ?'
                 ' मैं यूरिया वाइल ( रक्त एकत्र करने के लिए सेम्पल शीशी ) लेने गया था ।'
                 ' कहाँ हैं ?'
                 ' नहीं मिले, तैयार हो रहे हैं ।'
                 ' मेरे पास हैं, सुमित्रा ने दो वायल दिखाते हुए कहा ,' ज़नाब, रोमियो-जूलियट पढ़ रहे थे लाइब्रेरी में ।'
                 ' हूँ, तुमने कब देखा ?'
                 ' जब तुम पूरी तरह से डूबे हुए थे, मैं उठा लाई ये तुम्हारी टेबल से ।  वैसे भी पुस्तकों में डूबकर तुम सब भूल जाते हो ।'
                 ' पुस्तकें सदा साथ निभाती हैं ।'
                 ' उलाहना दे रहे हो ?'
                 ' नहीं, कहावत की बात है ।'
                 ' तुम इसी तरह सब भूल जाओगे, पुरानी आदत है ।'    
                 ' ये क्या बहस है?'  डा रेनू ने आश्चर्य से पूछा, ' तुम दोनों में कुछ हुआ है क्या ?'
                 'कभी कुछ हुआ ही तो नहीं ।' मैंने कहा ।
                 'सुमि मुस्कुराकर, घूरती हुई तेजी से वार्ड में चली गयी ।


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                                       ' ओह ! आई गौट इट'   अब मालुम हुआ आजकल क्यों दिखाई नहीं देते, गुप्त रहते हो ।'  लाइब्रेरी में क्या क्या गुल खिलाये जा रहे हैं, चुप चुप ।  बहुत चालू हो..... गोपाल ।  रोमियो-जूलियट ...हाऊ रोमांटिक ...।  तभी आजकल स्मार्ट होते जारहे हो दिन ब दिन ।  जी चाहता है तुम से शादी करलूं ।  पर सोचती हूँ लोग क्या कहेंगे?'  वार्ड से बाहर आते हुए लम्बी-चौड़ी मोटी नसरीन मुझे घूरते हुए चहकी ।
               ' क्या कहेंगे,  यही कि  वाह  ! क्या मस्त हथिनी और हथिनी शावक की सुन्दर जोड़ी है ।  लोग कमरा ले ले कर पीछे दौड़ेंगे,  हो सकता है टाइम पत्रिका के फ्रंट पर आजाय, " मेड फार ईच अदर " के शीर्षक के साथ ।' मैंने सहज भाव से कहा ।
                'बदमाश ! तुम तो बहुत ही ...ह ......।'
                'शट अप, नसरीन मोटी, क्या बके जारही है ? कुछ तो शर्म करो ।' सुमि  हंसते हंसते चिल्लाई ।
                'अरे वाह ! तुम कौन हो भई, ओब्जेक्शन करने वाली ?  क्या तुम्हें कोइ एतराज  है मेरे प्रस्ताव पर ?' नसरीन कमर पर दोनों हाथ रखकर पूछने लगी ।
                 ' गो टु हैल,'  मैं तो चलती हूँ ।'  सुमि जाने लगी ।
                 ' ल्लो  ....ओ ....।' तुम्हारा सिक्योरिटी गार्ड तो वाक् आउट कर गया ।' नसरीन ने थुल थुल देह से हंसते हुए सुमित्रा की पीठ पर कमेन्ट दे मारा ।


        **              **                 **


                                           इसी तरह चलती रही हमारी मित्रता । साहित्य, कला, राजनीति, स्त्री -पुरुष सम्बन्ध,पति-पत्नी रिश्ते, मेरी अपनी शादी, नारी-विमर्श, फ़िल्में , सामयिक घटनाएँ, कालिज की  राजनीति, चिकित्सा विषय, चरक, सुश्रुत, कश्यप, हिप्पोक्रेट, धर्म, दर्शन, अद्यात्म, विज्ञान ...लगभग प्रत्येक विषय पर चर्चाएँ होती थीं । प्रत्येक विषय पर उसकी स्वतंत्र  राय व टिप्पणी होती थी । दर्शन, धर्म, इतिहास पर गहन अध्ययन न होने पर भी सामान्य ज्ञान व तीब्र विवेक-बुद्धि के आधार पर उसकी टिप्पणियाँ सटीक होती थीं । गायन, वादन, नृत्य में तो वह कुशल थी ही ।
                                            छुट्टियों में जब वह दिल्ली जाती तो लौटकर विस्तार से बताती । रमेश के साथ कहाँ कहाँ घूमे , क्या क्या किया, क्या खाया ......। फिर अचानक चुप होकर कहती . अरे, मैं तुम्हें क्यों बोर कर रही हूँ । चलो भूल जाओ, काफी पीते हैं । मेरे पीछे पढाई ठीक से की या नहीं,  नोट्स कहाँ हैं,  क्या क्या लिखा सुनाओ ।  सारी कैफियत लेती .....और हाँ.. किसी को सिलेक्ट लिया या नहीं ।'
                  ' कभी रमेश से मिलवाओ तो ',  मैंने कहा  ' वो क्या कभी तुमसे मिलने यहाँ नहीं  आता ?'
                   ' मैं  ही हर छुट्टी में दिल्ली जाती हूँ, हर बार मिलना होता ही है । रमेश डे-स्कालर है, और छुट्टियों में  पिता के नर्सिन्ग होम में  काम,सीखना होता है । यहां आकर समय खराब करने का क्या फ़ायदा ।’  वह बोली,  ’ तुम टालो मत, बताओ तो ।’
                                                एक दिन काफ़ी हाउस में सुमि पूछ बैठी , ’ केजी ! कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है यह सोचकर कि क्या दो व्यक्ति इतने समान विचारों वाले हो सकते हैं । ’
                ' हाँ, यदि वे पिछले जन्म के भाई-भाई, भाई-बहन हों  या प्रेमी-प्रेमिका...या फिर  "आइड़ेंटीकल ट्विन्स " ( जुड़वां बच्चे ) ।'          
                वह आश्चर्य से बोली...'हर बात का उत्तर है तुम्हारे पास ..और तुरंत !'
                ' या फिर इस जन्म में अमर प्रेम के ध्वज वाहक ,' मैंने कहा ।
                             वह सोचते हुए होस्टल की और बढ़ने लगी , फिर मुडकर कहने लगी, ' अच्छा कोई लड़की पसंद की या नहीं ? और वह साईक्लिस्ट अनु ?'
                 मैंने कहा, सुनो ....
   " ऊधो ! मन नाहीं दस बीस । 
     एक था सो गयो संग राधिका, कौन फंसाए शीश ।"   
              '  हूँ, तो एसा करती हूँ ......अच्छा चलती हूँ ।'
                                 दो दिन तक सुमित्रा से बात ही नहीं हुई । वह अन्य छात्राओं से घिरी सीधी क्लास रूम में आती और उसी तरह सीधी हास्टल चली जाती । तीसरे दिन मैंने स्वयं ही रोक कर कहा, ' सुमि, तुमसे बात करनी है, चलो केन्टीन चलते हैं ।'  वह चुपचाप बिना बात किये साथ चलने लगी ।
                 ' क्या बात है, तबियत तो ठीक  है,  इतनी चुप चुप क्यों हो ? ये क्या  है  दो दिन से बात ही नहीं हुई ? क्या हुआ है ?'
                 ' एक साथ इतने सारे सवाल ? बस यूंही मैंने सोचा मैं ही तुमसे मिलना -जुलना बंद कर देती हूँ, यही ठीक रहेगा, प्रेक्टिस भी होजायेगी ।'  वह सीरियस बन कर बोली और चलने लगी ।
                 ' अच्छा, उस बात पर नाराज़ हो अभी तक ।'
                 हूँ, वह मुस्कुराते हुए बोली और जाने लगी ।
                ' अरे, एसा मत करना' , मैंने कहा, ' आखिर ऐसी भी क्या जल्दी है,  इतनी लड़कियां हैं, जब चाहें किसी को भी पटा लेंगें । कई को तो तुम  जानती ही हो ।'
                 ' अच्छा, एसा, सचमुच ?'  वह पलटकर हंसने लगी ।
                  'क्या विश्वास नहीं है मुझ पर ?'
                 ' येस ।' वह जाते जाते बोली ।
        
                        **                                **                        **

                                        ' बधाई, केजी, वाह ! तुमने तो एक भी गोल नहीं होने दिया । तभी टीम जीत पाई ।'  अंतर कालेज चेम्पियन शिप के लिए होरहे फुटवाल मैच  के समाप्त होने पर सुमित्रा ने मैदान पर बधाई देते हुए यह बात कही ।  मैच विश्व-विद्यालय की टीम से था जो नगर की सशक्त टीम थी ।  मैच बड़ी कठिनाई से १-० से हमारे पक्ष में रहा । मैंने धन्यवाद कहा तो सुमि कहने लगी, ' अच्छा कृष्ण तुम सदैव बैक-कीपर के स्थान पर क्यों खेलते हो ? फारवर्ड खेलो तो शायद कुछ ओर गोल से जीतें ।'
               ' कुछ और गोल हो भी तो  सकते हैं । भई, यह तो टीम-भावना का खेल है', मैंने चकित होते हुए कहा, 'कोई तो बैक रहेगा ही ।' 
              ' पर नाम तो केवल गोल करने वाले का होता है।'
              ' क्या मैंने नाम  के लिए कभी कोई काम किया है ?'  मैंने हंसते हुए प्रति-प्रश्न किया । ' हम तो वैसे भी बैक-बेन्चर्स हैं  और यदि एसा ही होता तो तुम मुझे क्रेडिट नहीं देरही होतीं ।'
              ' आप क्रिकेट खेला कीजिये ।  उसमें कोई बैक नहीं होता, सभी फ्रंट पर होते हैं, और सुमित्रा भी खुश।' कुमुद ने सलाह दी 
              ' हाथ-पैर भी ज्यादा टूटते हैं ।' मैंने हंसते हुए कहा, ' क्या मंतव्य है आपका कुमुद जी ?'
              सब हँसने लगे तो मैंने कहा,  ' वैसे आपका परामर्श विचार योग्य है । धन्यवाद ।'

                              **                       **                       ** 

                                             वार्ड-क्लिनिक के लिए  जब हम लोग मेडीकल वार्ड पहुंचे तो  हाउस डा. मुकुलेश रंगनाथन व रेजीडेंट डा. पी के सिंघल एम.डी. को एक रोगी से जूझते देखा । रोगी आक्सीजन पर था व काफी समय से भर्ती था। दोनों पैरों की नसों में सेलाइन -ग्लूकोज़ व नॉर-एड्रेलिन ड्रिप चढाई जा रही थी । दोनों डाक्टर बारी बारी से रोगी के ह्रदय की मालिश  व कृत्रिम श्वांस दे रहे थे ।  बीच बीच में कई बार सुई द्वारा सीधे ह्रदय में कोरामीन, एड्रेलिन व डेकाड्रोन भी दिया गया ।  लगभग आधे घंटे तक अथक परिश्रम के बाद भी रोगी को बचाया नहीं जा सका । एक बार पुनः रोगी की श्वांस,  ह्रदय की धड़कन व आँख की पुतली देख कर उसे मृत घोषित कर दिया गया ।
              ' सर !  क्या उसके बचने की आशा थी ?'  मैंने पूछा ।
              ' नहीं ।'  डा. सिंघल बोले,  ' सी ओ पी डी का पुराना रोगी था, ह्रदय व फैन्फड़े  पूरी तरह से खराब हो चुके थे ।'
             ' फिर, इतना सब करने की, क्या आवश्यकता थी ?'  
              डा. सिंघल सब को लेकर  नर्सेज चेंबर में आये।  बोले,  'डाक्टर जहां जीवन का प्रश्न होता है, वहां और कोई प्रश्न नहीं होता ।  प्रश्न परिश्रम, खर्च या समय व्यर्थ होने का नहीं है, प्रश्न है...आशा, आस्था, कर्म, आत्म-संतुष्टि, रोगी व रोगी के परिजनों की संतुष्टि का ।'
               ' हम ये सब इसलिए करते हैं कि कहीं मन के कोने में डाक्टर को, रोगी के परिजनों  को एक आशा होती है कि शायद कुछ क्षणों के लिए ही प्राण लौट आयें । शायद ईश्वर को मंजूर हो । यह आस्था है, यहाँ तर्क व नियम नहीं चलते, यह संसार है ।'
                 'चिकित्सक, यदि बचना तो है नहीं यह सोच कर प्रयत्न करना छोड़ दे तो उसे भी आत्मग्लानि रहेगी कि यदि प्रयत्न करते तो शायद......।  अतः अपनी आत्म-संतुष्टि के लिए भी प्रयत्न करना आवश्यक है । साथ ही यदि प्रयत्न ही नहीं होंगे तो नए नए अनुभव, प्रयोग, आविष्कार व रोगी सेवा-उपचार में प्रगति कैसे होगी ? यह विज्ञान है ।  जान जाते समय रोगी ने न जाने किस किस को पुकारा होगा । शायद सबसे अधिक डाक्टर को ।  रोगी की आत्मा व शरीर भी तो अंतिम समय आदर व सहानुभूति चाहते होंगे ।  उसके परिजनों को भी पूर्ण उपचार व सेवा की संतुष्टि होनी चाहिए कि डाक्टरों ने तो पूरा प्रयत्न किया आगे ईश्वर इच्छा ... अन्यथा लापरवाही समझी जायेगी । क़ानून के अनुसार भी रोगी को यथासंभव बचाने के टर्मिनल उपाय करना व रिकार्ड रखना वैधानिक दायित्व है । फिर मिरेकल्स भी तो होते हैं न ?'
                   ' यही है आज का प्रेक्टीकल सबक जो जीवन भर एक चिकित्सक  को  स्मरण रखना है । सहानुभूति, सहृदयता, दायित्व निर्वहन व कर्तव्य-पारायाणता  ही एक चिकित्सक के व्यवहारिक गुण होते हैं ।  समझे ....डाक्टर कृष्ण गोपाल !'  
                  ' यस सर !'  मैंने स्वीकृति में कहा । 
                  मुझे चुप-चुप चलते देख  कर सुमित्रा मुस्कुराने लगी, तो मैंने पूछा ,' क्या बात है ?'
                  ' मिला न शेर को सवा-शेर ।'
                  'क्या मतलब ?'
                 ' तुम जैसे ज्ञानी को भी ज्ञान देने वाला मिला न ।'
                 ' बहुत खुश हो ?'  
                 ' यस ।'
                ' सच है सुमित्रा ! हम जहां भी मानवीयता, सौहार्द व सहृदयता से चूकते हैं एवं किसी घटना, बिंदु या विषय पर गहराई से युक्ति-युक्त पूर्ण सोचने में लापरवाही करते हैं वहीं गलत निर्णय व सोच को आधार मिल जाता है  यहीं तो अनुभव व वरिष्ठता की महत्ता है । हम चाहे जितने भी ज्ञानी क्यों न होजायं, अनुभवी व सीनियर, सीनियर ही रहेगा ।' 
                 ' हार को स्वीकारना व  सत्य को तुरंत स्वीकार करना ही तो जीत है, जीवन है । तुम्हारी यही बात तो मन में अटक कर रह जाती है, कृष्ण ! मन को भटकाती है ।'
                 ' चलो तुम भी आज खींच लो, अच्छा मौक़ा हाथ आया है', मैंने कहा, " मत चूके चौहान ।"
                ' बात ठीक है तुम कभी कभी ही तो मौक़ा देते हो खींचने का '
                               **                     **                           **
                                             फाइनल ईयर की परीक्षाएं समाप्त होने पर मैं केन्टीन में बैठा न्यूज़-पेपर उलट रहा था कि सुमित्रा आई और धम से बैठती हुई बोली , 'अब मुझे जाना होगा केजी' उसके स्वर में उदासी थी ।
               "  हाँ, कहाँ ? ' मैं सोचते हुए बोला , 'कब ?'
              '  भूल गए ?',  'ऐसे तो तुम मुझे भी भूल जाओगे। जाते ही। मुझे दिल्ली जाना है, सुन रहे हो न, कल ।'                 'वह तो तुम हर बार जाती हो ।'
              ' हाँ, पर अब वापस नहीं आऊँगी ।'
               ओह, ओह ! हाँ, वास्तव में , ' अब तो तुम्हें जाना ही है ।'  मैंने अखबार एक तरफ रखकर कहा ।
              ' मेरी शादी पर आओगे ?'
               ' नहीं । बधाई, इंटर्नशिप भी वहीं करोगी ?'
              ' हाँ, अपनी शादी पर बुलाओगे ?'
               ' नहीं भी, और पता नहीं भी ।'
              ' हूँ, पक्के हो । सुमि  कहने लगी,-
                                               " तेरी दोस्ती का बोझ हमसे उठाया न गया ।
                                                बस यही बोझ सा दिल में लिए फिरते हैं ।"
              ' वाह क्या धाँसू शे'र है सवा शेर है ।  इसे कहते हैं गुरु दक्षिणा ।'
              ' मुझे याद करोगे भी या  " आउट आफ साईट आउट आफ माइंड "......'
             ' और  तुम...'  मैंने पूछा ।
              ' सुमि कहने लगी.....
                                            " जब चाहूँ मन में चले आना, 
                                             मन मंदिर को महका जाना ।
                                             यादें तेरी मन में मितवा,
                                             बन करके सदा मधुमास रहे ।। 
               अच्छा,  सुनो............
                                               " तू दूर रहे या पास रहे,
                                                यह अनुरागी मन यही कहे।
                                                तेरे जीवन की बगिया में,
                                                जीवन भर प्रिय मधुमास रहे ।"     
                                    
                           **                             **                              **
                  
                     ट्रेन पर सुमि को बैठकर  मैंने कहा, ' गुड बाय ।'
                   ' बाय बाय' , उसने उदास होते हुए कहा ।   'सचमुच बहुत याद आओगे ।'  वह लगभग अश्रु पूरित नेत्रों से बोली ।
                    मैं मुस्कुराया तो कहने लगी , ' तुम्हारी आँखों में कभी आंसूं नहीं आते ?'  'भगवान करे न आयें कभी ।'   मैं हंस कर रह गया ।
                    'याद रखोगे?' , सुमित्रा ने कहा । 
                    ' नहीं ।' मैंने कहा ...........
                                                "  हम तसब्बुर में न तेरे ख्याल लायेंगे ,
                                                  आवाज़ दिल से देना, बस चले आयेंगे ।" 
                     गाड़ी चल  दी और वह हाथ हिलाती हुई चली गयी । 
                           
                                       .............. अंक आठ समाप्त .....क्रमश अंक नौ ...अगली पोस्ट में .....